स्थानीय रिपोर्टर: इंदौर–खंडवा रेल लाइन को ब्रॉडगेज में बदलने की परियोजना एक लंबे इंतजार का रूप ले चुकी है। वर्ष 2008 में तकनीकी स्वीकृति मिलने के बाद शुरू हुई यह योजना अभी तक पूरा रूप नहीं ले सकी है। कई बार समय सीमा बढ़ाए जाने के बावजूद वर्तमान स्थिति संकेत देती है कि यह लाइन 2030 तक भी पूरी तरह संचालन योग्य नहीं हो पाएगी।
समय सीमा कई बार बढ़ी, सिंहस्थ 2028 से पहले संचालन की उम्मीद क्षीण
इस परियोजना की शुरुआती समय सीमा 2024 थी। बाद में इसे 2026, फिर 2028 तक बढ़ाया गया। लेकिन कार्य की स्थितियों को देखते हुए 2028 की समय सीमा भी व्यावहारिक नहीं लग रही है। इस बीच नैरो गेज लाइन बंद हुए 8 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, जिसके कारण निमाड़ और इंदौर क्षेत्र के लाखों यात्रियों को सड़क मार्ग पर निर्भर रहना पड़ रहा है। सड़क निर्माण कार्यों के चलते यह यात्रा और कठिन हो गई है।
सिंहस्थ 2028 से पहले संचालन की उम्मीद क्षीण
स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा कई बार कहा गया कि सिंहस्थ 2028 से पहले इस रूट पर ट्रेन संचालन संभव होगा। कुछ लोगों ने खंडवा–सनावद डेमू सेवा को ओंकारेश्वर तक चलाने की मांग भी उठाई। लेकिन रेलवे अधिकारियों का मत है कि घाट सेक्शन के पूरा हुए बिना इस रूट का कोई भी हिस्सा प्रारंभ करना तकनीकी रूप से संभव नहीं है। इस कारण 2028 के भीतर संचालन की उम्मीद भी कमजोर दिखाई देती है।
4.1 किमी लंबी सुरंग और घाट सेक्शन सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती
रेलवे के अनुसार इस परियोजना में 36 बड़े पुल, 76 छोटे पुल, 12 अंडरब्रिज, 3 ओवरब्रिज और 19 सुरंगें बनाई जानी हैं। इनमें घाट क्षेत्र में प्रस्तावित 4.1 किलोमीटर लंबी सुरंग सबसे बड़ी चुनौती है। नर्मदा घाटी का संवेदनशील भूगोल सर्वे, पुनःसर्वे और डिजाइन संशोधनों में वर्षों की देरी का कारण बना। यहीं काम सबसे अधिक धीमा है।
लागत बढ़कर 5393 करोड़ हुई, काम की गति धीमी
बार-बार DPR संशोधित होने और निर्माण सामग्री के महंगे होने से परियोजना की अनुमानित लागत बढ़कर 5393 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।
काम की वास्तविक प्रगति धीमी
लगभग 160 किलोमीटर लंबी इस लाइन में से करीब 60 किलोमीटर हिस्सा अभी तक पूर्ववत पड़ा है। अधिकारियों के अनुसार वन विभाग से अनुमति प्राप्त करने में समय लगा, लेकिन एनओसी मिलने के बाद भी काम में अपेक्षित गति नहीं आ सकी। महू–पातालपानी से आगे के हिस्से में टेंडरों की प्रक्रिया और डिज़ाइन परिवर्तन के कारण काम रुका रहता है। जानकारी के अनुसार दो ठेकेदार कंपनियां बीच में काम छोड़ चुकी हैं।
देरी का स्थानीय अर्थव्यवस्था और व्यापार पर सीधा असर
नैरो गेज लाइन बंद होने के बाद क्षेत्र के छोटे कस्बों और स्थानीय बाजारों पर इसका सीधा असर पड़ा है:
- मोरटक्का, सिमरोल, सनावद और बगलामुखी के व्यापार पर असर।
- छोटे व्यापारियों और विद्यार्थियों की यात्रा मुश्किल।
- कई रूटों पर बस किराए 2–3 गुना बढ़े।
- गांवों से शहरों तक रोजगार और माल ढुलाई का खर्च बढ़ा।






