द विराट केसरी इंदौर। ग्राम खोड़ी स्थित एसोसिएटेड अल्कोहल एंड ब्रेवेरीज लिमिटेड एक बार फिर डिस्टिलरी अपशिष्ट (DWGS) के कथित अवैध उपयोग और ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) व्यवस्था के उल्लंघन को लेकर चर्चा में है। आरोप है कि सेंट्रल पोलुशन कण्ट्रोल बोर्ड (CPCB) की संभावित जांच की सूचना सामने आते ही कंपनी परिसर में साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से तेज़ी से सफाई अभियान चलाया गया।
सूत्रों के दावे
आंतरिक सूत्रों के अनुसार-
- CPCB टीम के संभावित आगमन से पहले DWGS प्लांट लगभग चार दिन बंद रखा गया,
- पूरे परिसर में व्यापक सफाई कराई गई,
- पुराने औद्योगिक अपशिष्ट और संभावित साक्ष्यों को हटाया गया।
क्षेत्रीय अधिकारी का बयान
इस पूरे घटनाक्रम पर जब द स्पीक्स इंडिया ने मध्य प्रदेश पोलुशन कण्ट्रोल बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी श्री चौकसे से दूरभाष पर चर्चा की, तो उन्होंने कहा-
“जांच के लिए मैं नहीं, बल्कि CPCB की टीम आने वाली है।”
दो दिन इंतज़ार, जांच नहीं
इसके बाद लगातार 2 दिनों तक CPCB जांच दल का इंतज़ार किया गया, लेकिन-
- टीम ग्राम खोड़ी नहीं पहुंची,
- कोई आधिकारिक निरीक्षण नहीं हुआ,
- न ही सार्वजनिक रूप से कोई जांच रिपोर्ट सामने आई।
इसी बीच स्थानीय लोगों का दावा है कि चार दिन तक DWGS प्लांट बंद रहने के बाद, अगले ही दिन DWGS से भरी गाड़ियों का आवागमन फिर शुरू हो गया।
सबसे बड़ा सवाल: गोपनीय सूचना कैसे पहुंची?
स्थानीय नागरिकों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि CPCB जैसी केंद्रीय एजेंसी की जांच संबंधी सूचना सामान्यतः गोपनीय रहती है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं-
- जांच की जानकारी कंपनी को पहले से कैसे मिली?
- क्या इसी सूचना के आधार पर प्लांट बंद कर साक्ष्य हटाए गए?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिना किसी ऊपरी स्तर के संरक्षण के इतनी सुनियोजित तैयारी संभव नहीं।
जांच दल कंपनी तक क्यों नहीं पहुंचा?
मामले में एक और गंभीर प्रश्न यह है कि-
- जिस जांच दल के आने की बात कही गई, वह कंपनी परिसर तक पहुंचा ही क्यों नहीं?
- क्या किसी स्तर पर सांठगांठ या तकनीकी कारणों से जांच आगे नहीं बढ़ सकी?
प्रशासनिक पक्ष
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि प्रत्यक्ष उल्लंघन या अवैध परिवहन के प्रमाण मिलने पर ही तत्काल कठोर कार्रवाई संभव होती है। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि DWGS का अवैध उपयोग या परिवहन पाया गया, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
जनस्वास्थ्य और पर्यावरण का सवाल
डिस्टिलरी अपशिष्ट जैसे औद्योगिक कचरे को लेकर लगातार शिकायतों के बावजूद यदि जांच से पहले ही साक्ष्य हटाने के दावे सामने आते हैं और जांच दल मौके तक नहीं पहुंचता, तो यह केवल एक कंपनी का मामला नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है।
अब बड़ा सवाल यही है-
क्या जांच एजेंसियां अगली बार ठोस कार्रवाई के साथ मौके पर पहुंचेंगी, या फिर किसी बड़ी घटना के बाद ही हालात गंभीर माने जाएंगे?






