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बड़वाह खसरा-38 विवाद: चरनोई भूमि पर कब्जों से प्रशासन कटघरे में, सांसद के बाद अब विधायक बिरला ने कलेक्टर को लिखा पत्र

अंकुश कर्मा बड़वाह। खसरा-38 की सरकारी चरनोई भूमि को कब्जा मुक्त कराने की मांग लगातार तेज होती जा रही है। सोमवार को धरना स्थल पर भीड़ कम दिखी, लेकिन ग्रामीणों की आवाज पहले से अधिक मुखर रही।

चरनोई भूमि पर कब्जों को लेकर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पहले सांसद और अब विधायक ने भी राजस्व अधिकारियों की कार्यशैली पर खुलकर सवाल खड़े किए हैं।

खसरा-38: विधायक बिरला ने कलेक्टर और एसडीएम को भेजा पत्र

बड़वाह विधायक सचिन बिरला ने कलेक्टर और एसडीएम के नाम लिखे पत्र में कहा है कि शासन ने पशुओं के चरने के लिए चरनोई भूमि आरक्षित की है, लेकिन कुछ व्यक्तियों द्वारा इस भूमि को अवैध रूप से कब्जाने का प्रयास किया जा रहा है।

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विधायक ने पत्र में दो मुख्य मांगें की है-

  • चरनोई भूमि पर कब्जा करने वालों की पहचान कर बेदखली की कार्रवाई की जाए।
  • गरीब पट्टाधारियों की बेची गई अहस्तांतरणीय भूमि की निष्पक्ष सुनवाई की जाए, ताकि कोई भी लाभार्थी न्याय से वंचित न हो।

विधायक ने स्पष्ट लिखा है कि दोनों पक्षों की सुनवाई आवश्यक है, लेकिन राजस्व विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

खसरा-38 पर विधायक सचिन बिरला का पत्र

सांसद के बाद विधायक की चिट्ठी से बढ़ा दबाव: प्रशासन पर गंभीर कमियों का आरोप

इससे पहले सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल भी अहस्तांतरणीय भूमि विक्रय पर सवाल उठाते हुए पत्र लिख चुके हैं। अब विधायक के पत्र से प्रशासन पूरी तरह कटघरे में आ गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब जनप्रतिनिधियों को बार–बार पत्र लिखना पड़े, यह संकेत है कि प्रशासन स्तर पर गंभीर कमियां मौजूद हैं।

करोड़ों की अर्थव्यवस्था: नर्मदा किनारे चरनोई भूमि कब्जों की कथित अर्थव्यवस्था

धरना स्थल पर सोमवार को शांति जरूर रही, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि मुद्दा केवल एक गांव का नहीं, बल्कि पूरी नर्मदा किनारे की चरनोई भूमि बचाने का संघर्ष है। लोगों का आरोप है कि चरनोई भूमि पर वर्षों से अवैध कब्जे किए जा रहे हैं और यह “करोड़ों रुपये का खेल” बन चुका है।

  • स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, नर्मदा किनारे चरनोई भूमि और सरकारी जमीनों को “निजी” दिखाकर बेचने का कारोबार लंबे समय से चल रहा है।
  • ग्रामीणों का संकेत है कि ऐसे कार्य बिना उच्च संरक्षण के संभव नहीं।

धरना स्थल पर त्रिवेणी के पौधे पर लगे प्रिंट-आउट पर उठे सवाल

धरना स्थल पर लगा त्रिवेणी का पौधा भी चर्चा में है। ग्रामीणों के अनुसार यह पौधा 15 नवंबर को नर्मदा परिक्रमा के दौरान संतश्री नर्मदानंद बापजी महाराज द्वारा रोपा गया था। लेकिन पौधे पर लगाए गए एक साधारण प्रिंट-आउट को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जिसे कुछ ग्रामीण “माहौल प्रभावित करने का प्रयास” बता रहे हैं।

ग्रामीणों का आरोप: न सीमांकन, न नोटिस, अधिकारी कर रहे संवाद से किनारा

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हो रही है-

  1. न सीमांकन हुआ है।
  2. न कब्जा हटाने की कार्रवाई हुई है।
  3. न किसी अधिकारी का दौरा हुआ है।
  4. न कोई नोटिस जारी किया गया है।

धरने पर बैठे लोगों का आरोप है कि अधिकारी यहां से गुजरते तो हैं, लेकिन ग्रामीणों से संवाद करने से बचते हैं।

ग्रामीणों की मांग: भूमाफियाओं के खिलाफ यह मुद्दा संसद तक ले जाया जाए

ग्रामीणों ने सांसद और विधायक से अनुरोध किया है कि इस गंभीर मुद्दे को संसद में उठाया जाए। लोगों का कहना है, “भूमाफिया किसी दल या व्यक्ति के नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के दुश्मन हैं।” स्थानीय लोगों का मानना है कि प्रभाव तभी दिखेगा जब प्रशासन निष्पक्ष कार्रवाई करेगा। अन्यथा यह मामला फाइलों में अटका रहेगा और कब्जे जारी रहेंगे।

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खसरा-38 का विवाद अब केवल एक गांव का मुद्दा नहीं रहा। यह चरनोई भूमि, नर्मदा किनारे की सुरक्षा, गरीब पट्टाधारियों के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मामला बन गया है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो ग्रामीणों का यह विरोध धरने से आगे बढ़कर जनआंदोलन का रूप भी ले सकता है।

आर्यन सिंह
आर्यन सिंहhttps://theviratkesari.com/
स्थानीय मामलों पर 15 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले हमारे मुख्य लेखक। इनका ध्यान मध्य प्रदेश के हर जिले की ज़मीनी हकीकत, सामुदायिक विकास और प्रशासन से जुड़ी प्रासंगिक खबरों को सामने लाने पर रहता है।
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