प्रमुख बातें:
- मुर्दे का इलाज: मृत व्यक्ति के नाम पर काटी गई OPD पर्ची, और तो और 5 दिन की दवा भी लिख दी गई।
- फर्जी सर्टिफिकेट: बिना उचित सत्यापन और जांच के जारी कर दिया गया मेडिकल फिटनेस प्रमाणपत्र।
- रिश्वत का आरोप: अस्पताल कर्मचारी पर पैसे लेने का सीधा आरोप, सवाल यह कि क्या डॉक्टर तक भी पहुंचा हिस्सा?
- जांच की मांग: केवल कर्मचारी को बलि का बकरा न बनाया जाए, हस्ताक्षर करने वाले डॉक्टर की भी हो निष्पक्ष जांच।
अंकित कीवे (खरगोन)। जिला अस्पताल में एक के बाद एक चौंकाने वाले मामले सामने आ रहे हैं, जो यहां चल रहे बड़े फर्जीवाड़े की ओर इशारा कर रहे हैं। मृत व्यक्ति के नाम पर ओपीडी (OPD) की पर्ची कटने और दवा लिखे जाने के बाद, अब उसी प्रकरण में ‘मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट’ जारी होने का सनसनीखेज मामला सामने आया है।
इस पूरे फर्जीवाड़े में अस्पताल के एक कर्मचारी पर पैसे लेने (रिश्वत) का सीधा आरोप लगा है। लेकिन अब यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उस डॉक्टर की कार्य प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, जिसके हस्ताक्षर से यह प्रमाण पत्र जारी हुआ है।
डॉक्टर की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में क्यों?
मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट कोई मामूली कागज का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण कानूनी और स्वास्थ्य दस्तावेज होता है। नियमानुसार, इसे जारी करने से पहले डॉक्टर को संबंधित व्यक्ति की खुद शारीरिक जांच करनी होती है और उसके मूल दस्तावेजों का बारीकी से सत्यापन करना होता है।
यदि कर्मचारी ने पैसे लेकर यह सर्टिफिकेट बनवाया है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि डॉक्टर ने बिना व्यक्ति को देखे और बिना रिकॉर्ड जांचे ही अपने हस्ताक्षर कैसे कर दिए?
क्या पैसों का हुआ है बंदरबांट? उठ रहे हैं ये चुभते सवाल
इस गंभीर मामले में कई ऐसे पहलू हैं, जिन्हें बिना जांच के खारिज नहीं किया जा सकता। अब अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग से ये सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं:
- क्या डॉक्टर को इस बात की जानकारी थी कि कर्मचारी ने इस सर्टिफिकेट के एवज में हितग्राही से पैसे वसूले हैं?
- क्या कर्मचारी द्वारा ली गई इस अवैध राशि में डॉक्टर की भी कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी थी?
- या फिर कर्मचारी ने डॉक्टर को अंधेरे में रखकर इस पूरे फर्जीवाड़े को अंजाम दिया?
कड़ियों का जुड़ना: यह सिर्फ एक लिपिकीय गलती नहीं
एक ही मृतक के नाम पर पोस्टमार्टम का रिकॉर्ड दर्ज होना, फिर उसी नाम से OPD में 5 दिन का उपचार चलना और अंत में मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट के लिए पैसों का लेन-देन होना ये सारी कड़ियां बता रही हैं कि यह महज कोई रिकॉर्ड की चूक (Clerical Error) नहीं है। यह एक सुनियोजित तरीके से चल रहे रैकेट का हिस्सा हो सकता है।
सिर्फ कर्मचारी पर कार्रवाई कर मामले को रफा-दफा न करे प्रशासन
अब अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह इस मामले की लीपापोती न करे। जांच का दायरा केवल कर्मचारी से पूछताछ तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करने वाले डॉक्टर की भूमिका, प्रमाणपत्र की फाइल, मरीज की असली पहचान और उस समय मौजूद दस्तावेजों की भी गहन पड़ताल होनी चाहिए।
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भले ही अभी डॉक्टर द्वारा पैसे लेने की बात पूरी तरह प्रमाणित न हो, लेकिन कर्मचारी पर लगे आरोपों के बाद डॉक्टर के हस्ताक्षर और किसी संभावित आर्थिक लेन-देन की जांच की मांग पूरी तरह से जायज है। देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस फर्जीवाड़े की जड़ तक पहुंचता है या फिर खानापूर्ति कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देता है।





